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राजनारायण दुबे और बॉम्बे टॉकीज़ की कहानी - अध्याय 2


'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़ ही क्यों ?


सिनेमा के प्रति मेरा लगाव बचपन से ही था और इस विषय पर पुस्तक लिखने का विचार अर्से से दिल-ओ-दिमाग में घूम रहा था पर सिनेमा जैसे विशाल विषय पर सही शुरुआत कैसे हो समझ नहीं आ रहा था। नायक-नायिकाओं पर तो कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, मगर अब भी सिनेमा जैसे अप्रतिम कला के कई ऐसे अनछुए एवं अनजाने विषय हैं, जिन पर पुस्तक लिखी जा सकती है। १९७५ का दौर था और फिल्म 'शोले' अपनी सफलता का परचम लहरा रही थी। 'शोले' की सफलता को देखकर याद आया कि 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' की फिल्म 'किस्मत' ने (१९४३) में १८२ सप्ताह तक चल कर नया रिकार्ड बनाया था, इस रिकार्ड को ३९ साल बाद 'शोले' ने तोड़ा, राजनारायण दूबे द्वारा स्थापित 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' ने न जाने कितने नायक, नायिका, लेखक, निर्देशक, गायक, गायिका, गीतकार एवं संगीतकार विश्व को दिए शायद इसीलिए अचानक मन में यह विचार आया कि क्या न 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' एवं 'बॉम्बे टॉकीज घराना' पर पुस्तक लिखा जाए? भारतीय सिनेमा के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी और प्रथम व्यवसायिक कम्पनी के साथ-साथ महत्वपर्ण योगदान देन वाला सिनेमा कम्पनी 'द बॉम्बे टॉकीज स्टडियोज' ही है। एक ऐसा सिनेमा कम्पनी जिसने भारतीय सिनेमा की ऐसे समय में पहचान दिलाई जब भारतीय सिनेमा अपनी पहचान बनाने के लिए जी-तोड़ संघर्ष कर रहा था।


लगभग ९ दशक पूर्व जब भारतीय सिनेमा अपनी पहचान बनाने के लिए अथक प्रयत्नशील था, तब ऐसे में अत्याधुनिक सुखसविधाओं के साथ भारत में फिल्म निर्माण की परिकल्पना को साकार किया कलकत्ता के कालीघाट में जन्में और बम्बई के जाने-माने व्यवसायी सेठ बद्रीप्रसाद दूबे के प्रतिभाशाली पुत्र राजनारायण दूबे ने। हालाँकि इस आधुनिक फिल्म निर्माण कम्पनी की परिकल्पना हिमान्शु राय की थी, पर राजनारायण दूबे के आर्थिक, आत्मिक और नैतिक सहयोग के कारण ही 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' जैसी ऐतिहासिक फिल्म कम्पनी का निर्माण सम्भव हो सका। राजनारायण दूबे द्वारा तन-मन-धन से किए गए प्रयासों का ही परिणाम रहा कि भारत के व्यावसायिक शहर बम्बई (अब मुम्बई) में राजनारायण दूबे की माँ गायत्री देवी जो माँ मुम्बा देवी की अनन्य भक्त थीं, के द्वारा सुझाये गए 'बॉम्बे टॉकीज़' नाम पर भारत की एक बेहद अत्याधुनिक फिल्म निर्माण कम्पनी की शुरुआत हुई।


अपनी माँ गायत्री देवी का आशिर्वाद लेकर राजनारायण दूबे ने 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' की बुनियाद रखी, जिसके तहत उन्होंने सबसे पहले अपने व्यक्तिगत स्वामित्व के रूप में प्रोप्राइटरशिप के तहत 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' की शुरुआत की। इसके साथ ही उन्होंने दो और निजी स्वामित्व वाली कम्पनियों की भी शुरुआत की जिनके नाम 'बॉम्बे टॉकीज पिक्चर्स' और 'बॉम्बे टॉकीज लैब्रोटरीज' थे। हिन्दी सिनेमा के साथ लोगों को जोड़ने के अपने दरगामी परिणाम केन्द्रित सोच के तहत उन्होंने भारत की पहली कॉरपोरेट फिल्म कम्पनी 'द बॉम्बे टॉकीज़ लिमिटेड' की भी स्थापना की। वह भारत की पहली ऐसी फिल्म कम्पनी बनी, जो इंडियन कम्पनी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हुई। साथ ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेन्ज की सूची में भी इसका नाम रजिस्टर हुआ। उस समय की यह पहली ऐसी कम्पनी बनी जो सुनियोजित तरीके से फ़ाइनेंशियल स्तर पर बहुत मजबूत कम्पनी थी। राजनारायण दूबे ने कई समृद्ध व्यवसायी, प्रतिभाशाली लेखक आदि को इस कम्पनी के साथ जोड़ा। साथ ही उन्होंने हिमान्शु राय, देविका रानी को कलाकार और केयर टेकर के रूप में पारश्रमिक के तौर पर तथा कम्पनी के कुछ प्रतिशत शेयर भी दिये। इन कम्पनियों का नाम भले ही अलग-अलग हो पर इन सभी कम्पनियों को सामान्यत: 'बॉम्बे टॉकीज़' के नाम से ही जान अधिकतर फिल्मों का निर्माण 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज' के तहत किया गया पर कुछ फिल्मों का निर्माण 'बॉम्बे टॉकीज़ पिक्चर्स' और 'द बॉम्बे टॉकीज लिमिटेड' के बैनर के तहत भी किया गया। 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' के सर्वेस राजनारायण दूबे के स्वामित्व की मूल कम्पनी 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टडियोज और 'बॉम्बे टॉकीज़ पिक्चर्स' ने अपनी खुद की फिल्मों के अलावा निर्माताओं और दूसरे बैनर की सैकड़ों फिल्मों के निर्माण में सहयोग किया।

फिल्मों का सफलतापूर्वक वितरण कर एक नया आयाम स्थापित किया, जो आज तक एक मिसाल है। यही कारण है कि बॉम्बे टॉकीज़ को भारतीय फिल्म उद्योग में एक कालजयी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन सबकी बुनियाद में राजनारायण दूबे की पूर्ण स्वामित्व वाली वित्तीय कम्पनी 'दूबे कम्पनी' एवं 'दूबे इंडस्ट्रीज़' का या ऐतिहासिक एवं अमूल्य रहा है।


सिनेमा के प्रारंभिक इतिहास काल में 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टडियोज' को उच्च स्तरीय फिल्म निर्माण कम्पनी का सम्मान बना बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' अन्तरराष्ट्रीय स्तर का एक ऐसा स्टूडिया जिसकी सुविधाओं में साउण्ड और इको प्रूफ स्टेज, लैब, एडिटिंग रूम, प्रिव्यू थियेटर जैसी सुविधाऐं उपलब्ध थीं। प्रारंभिक समय में 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के साथ जर्मन तकनीशियन फ्रेन्ज ऑस्टिन भी जुड़े, जिसकी वजह से फिल्मों का स्तर बहुत ऊंचा रहा। इस बात का श्रेय राजनारायण दूबे को ही जाता है कि उन्होंने भारतीय सिनेमा को पूर्ण व्यावसायिक और उच्चस्तरीय बनाया। 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के निर्माण से पहले भारतीय फिल्मों का निर्माण महापुरुषों की जीवनी या रुढ़िवादिता जैसे विषयों पर हुआ करता था, लेकिन इस बात का भी श्रेय राजनारायण दूबे को ही जाता है कि जिन्होंने लोगों के लाख मना करने के बाद भी हिन्दू लड़के और अछूत लड़की के बीच पनपे प्यार की कहानी को उस दौर में फिल्म 'अछूत कन्या के रूप में पर्दे पर उतार कर पूरे देश में सामाजिक बदलाव की एक कहानी रच दी। इसके बाद 'अछूत कन्या से प्रभावित होकर हज़ारों लोगों ने जाति-प्रथा को तोड़कर अन्तरजातीय प्रेम विवाह किया।

'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' को इस बात का भी गौरव हासिल है कि उसने अशोक कुमार, राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनन्द के साथ ही देविका रानी, मधुबाला जैसी वीनस का परिचय सिनेमा की दुनिया से कराया। आज के नायक हों या नायिका, सभी इन्हीं महान कलाकारों से सीख लेकर सफलता की बुलंदियों तक पहुंचे। एण्टीहीरो वाली भूमिका की शुरुआत अशोक कुमार ने की तो अमिताभ बच्चन ने उसे अपनाकर महानायक का सम्मान हासिल किया। गम्भीर भूमिकाओं के लिए राज कपूर और दिलीप कुमार पाठशाला बने, तो रोमान्टिक नायक और छैल छबीले नायक के लिये देव आनन्द। ऐसे कई प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारण रहे कि 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' जैसी फिल्म निर्माण कम्पनी पर पुस्तक लिखने का निर्णय लिया। तब से लेकर अब तक दो बार इस विषय पर पहले भी लिख चुका हूँ, मगर सही जानकारी, साधनों, समय के अभाव और रोजी रोटी कमाने के दबाव के चलते इतने विस्तार से नहीं लिख सका था। जीवन में अनुभव एवं समय के साथ-साथ सुविधाएं और अधिक जानकारी मिलती गई तो जीवन के उत्तरार्ध में संपूर्ण रूप एवं विस्तार से 'द बॉम्बे टॉकीज स्टूडियोज़' जैसे विषय पर महागाथा के रूप में एक बार का निर्णय लिया।


'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' का नाम आते ही एक सीधी-सादी छवि हिमान्शु राय की उभरती है। स्वाभाविक भी है, हिमान्शु राय अभिनय के कारण एक जानी पहचानी हस्ती बन चुके थे पर वह आर्थिक रूप से कमज़ोर थे। यदि इस बात पर गम्भीरता से विचार किया जाये तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि जब हिमान्शु राय को अपना कार्य साकार करने के लिए आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा और कई रातें बिना कुछ खाए-पीए गुजारनी पड़ी तो केवल प्रतिभा, सोच और महत्वाकांक्षा बल पर हिमान्शु राय 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के जनक कैसे हो सकते थे? इतना ही नहीं वह भी ऐसे समय में जब भारतीय सिनेमा की अपनी कोई पहचान नहीं थी, इस दुनिया के लोगों को लोग शंका और हेय दष्टि से देखा करते थे, ऐसे में किसी भी फिल्म कम्पनी तो क्या किसी भी फिल्म के लिए पैसा लगाने वाले व्यक्ति के बारे में सोच पाना ही असंभव था।

यही कारण रहा कि लन्दन से असफल हो कर वापस आने के बाद हिमान्शु राय बम्बई आकर किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो फिल्मों के लिए पैसों की व्यवस्था करा सके। कई व्यवसायियों और पैसे वालों से मुलाकात होने के बाद भी जब हिमान्शु राय को सफलता मिलती नहीं दिखाई दी तो उन्होंने आत्महत्या तक करने का असफल प्रयास भी किया। उनकी इस हालत के बारे में जब 'दूबे इंडस्ट्रीज़' के मालिक और शेयर बाज़ार के टायकून राजनारायण दूबे को पता चला तो एक कलाकार की त्रासदी से द्रवित होकर उन्होंने रिस्क लेकर हिमान्श राय को फाइनेन्स करने का निर्णय लिया।

यह बात सिनेमा इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरो में साफ-साफ दर्ज है कि राजनारायण दूबे ने हिमान्श राय को जब फाइनेन्स का भरोसा दिया तब उन्होंने अपने क़रीबी एक वकील एक अर्थशास्त्री, एक राजनीति और चांदी के एक प्रमुख व्यवसाय को भी जोड़ा। ज्ञातव्य है कि ये लोग राजनारायण दूबे के परम मित्र थे और इस तरह 'द बॉम्बे टॉकीज स्टूडिओज' की स्थापना हुई और "बॉम्बे टॉकीज घराना' का बुनियाद पड़ी और साथ ही उनका मानना था कि संगीत भारत का प्राण है, आत्मा है, फिल्मों की दुनिया तो अब शुरू हुई है, लेकिन संगीत तो आदिकाल से है, लोकगीत के माध्यम से देश का बच्चा-बच्चा संगीत से जुड़ा हुआ है। वह चाहे भक्ति रस हो चाहे वीर रस हो या माँ कि लोरी हो। सनातन भारत के सोलह संस्कारों में संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है। जहां जन्म से ही बच्चों के कानों में संगीत का प्रवाह बहता है। अपने सनातन सरोकारों का ध्यान रखते हुए उन्होंने 'बॉम्बे टॉकीज़' में संगीत को सबसे ऊँचे स्थान पर रखा। परिणाम यह हुआ कि उस दौर में 'बॉम्बे टॉकीज' के गाने सर्वश्रेष्ठ हुआ करते थे एवं लोकप्रियता के मापदंड पर खरे उतरते थे। साथ ही उसकी सहयोगी कम्पनियाँ भी बनीं, जिनका नाम 'द बॉम्बे टॉकीज पिक्चर्स' और 'द बॉम्बे टॉकीज़ लेबोरेट्रीज़' था, उन्होंने 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' के प्रचार के लिए 'बॉम्बे टॉकीज प्रचार समिति भी बनाई थी। यह सभी कम्पनियाँ राजनारायण दूबे की मालिकाना अधिकार वाली कम्पनियाँ रही। साथ ही उन्होंने 'द बॉम्बे टॉकीज लिमिटेड' नाम से भी एक कम्पनी शुरू की। इस बैनर में फिल्मों का निर्माण कम हुआ क्योंकि यह कम्पनी भागीदारी वाली कम्पनी थी। इस कम्पनी में हिमान्शु राय और देविका रानी को भी रखा गया और इसके शेयर बाज़ार में भी बेचे गये, मगर अधिकतर शेयर राजनारायण दूबे ने अपने पास ही रखे। इस बात के प्रमाण उन सभी फिल्मों के बैनर्स, पोस्टर्स और टाइटल्स हैं, जो इस पुस्तक में भी आपको आगे दिखाई देंगे, जिन पर 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' की सभी कम्पनियों के नाम सुनहरे शब्दों में दर्ज हैं।

इन सभी कम्पनियों ने "द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़” नाम के अन्तर्गत राजनारायण दूबे के स्वामित्व और नेतृत्व में लगभग ११५ फिल्मों का निर्माण, २५९ फिल्मों का वितरण, ४०० सिनेमाघरों का निर्माण किया। इतना ही नहीं, २८० से भी कहीं अधिक सिनेमा हस्तियों, कलाकारों, तकनीशियन्स को मायावी सिनेमा जगत में जन्म दिया।

विवाद की वजह से 'बॉम्बे टॉकीज़' के असमय बंद हो जाने के कारण भारतीय सिनेमा जगत के स्तम्भ पुरुष एवं 'बॉम्बे टॉकीज घराना' के सर्वेसर्वा राजनारायण दूबे को जीवन भर इस बात का अफसोस था कि 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' के तहत वो 'बॉम्बे टॉकीज़ म्यूजिक कम्पनी ही स्थापना नहीं कर पाए।

'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' एवं 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' के दूसरे संस्करण में वरिष्ठ पत्रकार सतीश वशिष्ठ, वयोवृद्ध पत्रकार मेरे मित्र इसाक मुजावर और २० साल से भी ज्यादा समय तक माया (फिल्म पत्रिका) के लोकप्रिय पत्रकार और सम्पादक रहे जेड. ए. जौहर पुस्तक की रचना करने में बड़ी मदद की थी, पर मुझे बहुत दुःख है कि तीसरे संस्करण में मुझे उनका साथ नहीं मिल पाया, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।


मुझे इस बात का गर्व है कि कई सालों से उठ रही लाखों लोगों कि भारी मांग पर 'बॉम्बे टॉकीज़ घराना' एवं 'द बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियोज़' जैसी महान ऐतिहासिक सिनेमा कम्पनी के साथ ही 'बॉम्बे टॉकीज़' के स्तम्भ पुरुष राजनारायण दूबे, उनके सहयोगी हिमान्शु राय एवं देविका रानी के साथ ही 'बॉम्बे टॉकीज़' से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर और उसकी मूल एवं सहयोगी कम्पनियों पर विस्तार से किताब लिखकर उनके बारे में सिनेमा जगत में फैले आधे-अधूरे, घृणित एवं अधकचरे ज्ञान की सफाई करने और आप सबके बीच आने का सुनहरा अवसर मिला।


लेखक : वरिष्ठ फिल्म पत्रकार कृष्ण मोहन श्रीवास्तव

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